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मंदिर में जाने का तरीका

भगवान में विश्वास,
शक्ति का संचार

श्री ब्रह्मपीठ डाकोर धाम की स्थापना श्री रामानंद सम्प्रदाय मे हुए सिद्ध सन्त श्री ब्रह्मदास जी महाराज के द्वारा की गई।

मंदिर

तैयारी:- मंदिर जाने से पहले, आपको आपके सामान को संगठित और तैयार करना होगा। ध्यान दें कि कुछ मंदिरों में श्रद्धालुओं को कुछ नियमों का पालन करना पड़ सकता है, जैसे मंदिर में चप्पलें नहीं पहननी हो सकती हैं या सिर पर पटका या कपड़ा ढ़कना हो सकता है।

आदरपूर्वक प्रवेश:- मंदिर में प्रवेश करते समय, सभी धर्मस्थलों में आदर्श रूप से आपको पूर्वाह्न या श्रद्धापूर्वक भावना के साथ प्रवेश करना चाहिए। आपको मंदिर के नियमों और परंपराओं का पालन करना चाहिए।

पूजा और दर्शन:- मंदिर में पहुंचने के बाद, आप पूजा और दर्शन कर सकते हैं। यह आपकी आस्था और अनुभव पर निर्भर करेगा। आप देवी-देवताओं के सामने धूप, दीप, फूल आदि अर्पण कर सकते हैं और उनसे आशीर्वाद मांग सकते हैं।

स्त्रोत पाठ और प्रार्थना:- कई मंदिरों में स्त्रोत पाठ और प्रार्थना आयोजित की जाती है। आप इनमें भाग ले सकते हैं और अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं का विचार कर सकते हैं।

डाकोर धाम का परिचय

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श्री ब्रह्मपीठ डाकोर धाम की स्थापना श्री रामानंद सम्प्रदाय मे हुए सिद्ध सन्त श्री ब्रह्मदास जी महाराज के द्वारा की गई ।

श्री ब्रह्मदास जी महाराज की एक कथा इस प्रकार है एक बार आप भूल से अन्य सन्त गुरुभाई की कोपिन पहन की लिए थे। फिर कभी भविष्य में मर्यादा भंग ना हो यह विचार कर अपने काठ (काष्ट) का आडबन्ध और कोपिन धारण करके काठ (काष्ट) के ही पात्र रख लिय इससे सन्त समाज अप्रसन्न हो गया, सन्त समाज की प्रसन्नता के लिए अपने काष्ठ के पात्रों में ही सन्तों को प्रसाद पंवाया इस पर सन्त समाज प्रसन्न होकर काठिया को उपाधि दी तथा ब्रह्मपीठ की स्थापना हुई।

इसी से आपके संबंधित सन्त काष्ठादि के आडबन्ध कोपिन आदि धारण करते हैं और काठिया कहलाते है, आपने भगवान की भावना जन जन के हृदय मे जागृत करने के उद्देश्य से सन्तो की जमात लकर संपूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण करते रहते थे। आप किसी गरीब ब्राह्मण के इकलौती सन्तान बच्चे को प्राण दान भी दिये थे।

श्री नारायणदास जी महाराज श्री बाबा जी महाराज की सेवा में त्रिवेणी धाम वि.सं. 2004 में आ गये थे। तब से ही आश्रम का सब कार्य भार देखने लगे थे। श्रीसद्गुरुदेव भगवान् के सान्निध्य में बहुत कठोर तपस्या करते रहे। बारह (12) वर्ष तक ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की धूप में 12 बजे से 3 बजे तक बालू (मिट्टी) में तपते रहे और वर्षा ऋतु में भगवान् श्रीजगदीशजी के पहाड़ पर बैठ कर श्रीराम मंत्र का पूरश्चरण प्रतिवर्ष 12 वर्ष तक करते रहे। शरद ऋतु में श्रीगंगाजल में बैठकर कठिन साधना करते रहे। तपस्या काल में उपवास मौन रहना आदि कठिन व्रतादि का पालन करते रहे। महाराजश्री का त्रिवेणी धाम में गद्यानिषेक वि.सं. 2028 में हुआ और काठिया, खाक चीक ब्रह्मपीठ डाकोर धाम का गद्याभिषेक ब्रह्मपीठाधीश्वर के पद पर वि.सं. 2055 पौष बुदी एकम् शुक्रवार दिनांक 4.12.1998 को हुआ था। महाराजश्री का शाही स्नान प्रथम सीट पर पहली बार माघ सुदी बसन्त पंचमी सोमवार वि.सं. 2057 सन् 2001 प्रयाग महाकुम्भ के पर्व में और श्रीकाठिया नगर डाकोर खाक चौक और त्रिवेणी धाम खालसा की स्थापना तथा दस्तावेज वि.सं. 2059 दिनांक 25 अगस्त 2003 मेंनासिक महाकुम्भ पर्व में हुई। महाराजश्री का श्रीखोजीद्वाराचार्य पदाभिषेक वि.सं. 2060 दिनांक 1 जनवरी 2004 में तीनों अ अखाड़ों के श्रीमहन्तों सहित भारत के समस्त सन्त समाज के द्वारा अहमदाबाद गुजरात में हुआ। महाराजश्री ने प्राणीमात्र के हितार्थ अपना जीवन समर्पण कर दिया जैसा कि वर्तमान में ऐसा महापुरुष न तो दूसरा है और न भविष्य में होने की संभावना है। जिन्होंने जहाँ जिस वस्तु का अभाव देखा, वहाँ वहीं वस्तु सुलभ करवा दी।

ऐसे आपके हजारो -चमत्कार हैः-

आपके चमत्कारो का और महिमा का वणन करना असंभव है आपकी मूल पीठ श्री ब्रह्मपीठ काठिया खाक चौक डाकोर धाम में है यह काठिया परिवार के सन्तों की अचार्य पीठ है इसके अलावा श्री अयोध्या जी उ.प्र श्री वृन्दावन धाम, जनकपुरधाम नेपाल, त्रिवेणीधाम राज. काठियावाड गुजरात प्रान्तों में काठिया सन्त आदि पाये जाते है।

इस ब्रह्मपीठ श्री ब्रह्मपीठाधीश्वर काठिया परिवाराचार्य श्री खोजी जी द्वारा चार्य गौ ब्राह्मण सन्त सेवी वैष्णव कुल भूषण स्वामी श्री नारायणदास जी महाराज का गधाभिषेक पौष बुदी एकम् विस. 2055 को हुआ और भगवान श्री नृसिंह देव का नया मन्दिर बनवाकर उसमें विराजित करवाया और ब्रह्मपीठ का जीर्णोद्वार करवाया।

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