नारायण दास जी महाराज

ब्रह्मपीठाधीश्वर पद्मश्री विभूषित श्री नारायण दास जी महाराज का जीवन परिचय

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श्री नारायणदास जी महाराज की जन्म ग्राम चिमनपुरा के गौड़ ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ। पिता श्रीरामदयाल जी शर्मा एवं मात श्रीमती भूरी बाई वि.सं. 1984 शाके 1849 आश्विन बुदी सप्तमी शनिवार रोहिणी नक्षत्र में जन्म कर्क लग्न में सूर्य कन्या राशि में चन्द्रमा वृष का मंगल कन्या का बुध कन्या राशि में गुरु मीन राशि का शुक सिंह राशि में शनि वृश्चिक राशि का राहु मिथुन राशि में केतु धनु राशि में हर्षल मीन और नेप सिंह राशि में प्लुटो मिथुन राशि का है। आप महापुरुष तो हैं ही ग्रह गोचर के हिसाब से भी अवतार पुरुष हैं।

भक्ति-वैराग्य स्वरूपा माता श्रीमती भूरी देवी को माँ, मदालसा अथवा माता मैनावती का अवतार कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। जैसे मी मदालसा ने अपनी सन्तानों के लिए मुक्ति का द्वार खुलवा दिया था अथवा जैसे माता मैनावती ने पुत्र गोपीचन्द की अल्पायु बारह वर्ष की होने पर भी गुरु गोरखनाथ की शरण में डाल कर अजर-अमर बना दिया। वैसे ही माता श्रीमती भूरीदेवी ने बाबाजी श्रीभगवानदासजी महाराज के चरणों में समर्पित करके श्रीनारायणदासजी महाराज को अजर-अमर अविनाशी - अक्षय अव्यक्त- परम पद के अधिकारी बना दिया जो क्षय रोग की अन्तिम सोमा पर पहुँच चुके थे।

श्री नारायणदास जी महाराज श्री बाबा जी महाराज की सेवा में त्रिवेणी धाम वि.सं. 2004 में आ गये थे। तब से ही आश्रम का सब कार्य भार देखने लगे थे। श्रीसद्गुरुदेव भगवान् के सान्निध्य में बहुत कठोर तपस्या करते रहे। बारह (12) वर्ष तक ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की धूप में 12 बजे से 3 बजे तक बालू (मिट्टी) में तपते रहे और वर्षा ऋतु में भगवान् श्रीजगदीशजी के पहाड़ पर बैठ कर श्रीराम मंत्र का पूरश्चरण प्रतिवर्ष 12 वर्ष तक करते रहे। शरद ऋतु में श्रीगंगाजल में बैठकर कठिन साधना करते रहे। तपस्या काल में उपवास मौन रहना आदि कठिन व्रतादि का पालन करते रहे। महाराजश्री का त्रिवेणी धाम में गद्यानिषेक वि.सं. 2028 में हुआ और काठिया, खाक चीक ब्रह्मपीठ डाकोर धाम का गद्याभिषेक ब्रह्मपीठाधीश्वर के पद पर वि.सं. 2055 पौष बुदी एकम् शुक्रवार दिनांक 4.12.1998 को हुआ था। महाराजश्री का शाही स्नान प्रथम सीट पर पहली बार माघ सुदी बसन्त पंचमी सोमवार वि.सं. 2057 सन् 2001 प्रयाग महाकुम्भ के पर्व में और श्रीकाठिया नगर डाकोर खाक चौक और त्रिवेणी धाम खालसा की स्थापना तथा दस्तावेज वि.सं. 2059 दिनांक 25 अगस्त 2003 मेंनासिक महाकुम्भ पर्व में हुई। महाराजश्री का श्रीखोजीद्वाराचार्य पदाभिषेक वि.सं. 2060 दिनांक 1 जनवरी 2004 में तीनों अ अखाड़ों के श्रीमहन्तों सहित भारत के समस्त सन्त समाज के द्वारा अहमदाबाद गुजरात में हुआ। महाराजश्री ने प्राणीमात्र के हितार्थ अपना जीवन समर्पण कर दिया जैसा कि वर्तमान में ऐसा महापुरुष न तो दूसरा है और न भविष्य में होने की संभावना है। जिन्होंने जहाँ जिस वस्तु का अभाव देखा, वहाँ वहीं वस्तु सुलभ करवा दी।

महाराजश्री ने शिक्षार्थ विद्यालय भवन बनवाये। रोग मुक्तार्थ चिकित्सालय एवं भगवत उपासनार्थ प्राचीन मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाया। श्री कौशल्यादासजी महाराज और श्रीबाबाजी महाराज के गुरुभाइयों की भाँति प्रगाढ़ प्रेम था। आपस में एक-दूसरे के बिना अधिक समय नहीं रह सकते थे। श्रीनारायणदासजी महाराज के प्रति दोनों महापुरुषों का अगाध वात्सल्य स्नेह था।

श्री कौशल्यादास जी महाराज महाराजश्री के साधक गुरु के स्वरूप में थे। उन्होंने श्रीमहाराजजी को अध्यात्म राम रक्षा एवं विश्व मोहन श्रीरामकवचादि सिद्ध कराने में पूर्णरूप कृपा अनुग्रहित रहे। आपने अपना स्थान जो रेलवे स्टेशन के पास जयपुर में है, उसको श्रीमहाराजजी के नाम लिख दिया था। महाराजश्री ने जिसका जीर्णोद्धार करके श्रीरामशरणदासजी महाराज को महन्त बना दिया। जो सुचारु रूप से गो-सेवा, भगवत सेवा और सन्त सेवा कर रहे हैं। श्री कौशल्यादासजी महाराज वि.सं. 2023 पौष बुदी अमावस्या मंगलवार को साकेत धाम पधारे। उनके बाद में श्रीमहाराजजी ने श्रीप्रेमदासजी को महन्ताई दी। फिर वि.सं. 2038 पौष सुदी सप्तमी को उनका साकेत धाम हो गया।

उनके उपरान्त वि.सं. 2038 माघ बुदी नवमी सोमवार को श्री रामशरणदासजी (रामपुरा चेला श्री हनुमानदास जी) को महन्ताई दी।